पारसनाथ सिंह

ये क्षेत्रीय स्तर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई थी। जब शहीद उमाकांत सिंह को ब्रिटिश सरकार द्वारा बलिदान देना पड़ा, तब इन्होंने ज़िरादेई स्टेशन को जलाकर विरोध प्रकट किया था। इन्हें राघवेंद्र सिंह और चन्द्रकृति सिंह का राजनीतिक गुरु माना जाता है। ये खादी के प्रचारक रहे और जीवनभर खादी वस्त्रों का ही प्रयोग किया।