राघवेन्द्र सिंह

ये यात्रा प्रेमी, जनसंपर्क में कुशल और सेवा भाव से ओत-प्रोत व्यक्तित्व हैं। गाँव में इन्हें ‘पारस बाबू के चेले’ के रूप में जाना जाता है, जैसा कि लोग कहते हैं—”पारस बाबू के दो चेले, कृति बाबू और राघो बाबू”। ग्रामीणों की सहायता में सदैव तत्पर रहते हैं और सामाजिक संवाद में उनकी भूमिका सराहनीय रही है।