सहबुढ़न साई, जिन्हें गाँव के लोग “सापुरन बाबा” कहकर पुकारते हैं, नरेन्द्रपुर ग्राम की सामुदायिक स्मृति में एक सिद्ध फकीर के रूप में स्थापित हैं। कहा जाता है कि वे गाँव में वर्षों पूर्व निवास करते थे और उनकी इच्छा थी कि वे इसी गाँव में समाधि लें। ग्रामवासियों ने उनकी इस भावना का सम्मान करते हुए उन्हें भक्ति भाव से ‘बजका-भात’ अर्पित किया और उनकी समाधि में सहयोग किया।
सहबुढ़न साईं की विशेषता यह रही कि वे हिन्दू और मुस्लिम—दोनों समुदायों के श्रद्धा केंद्र बने। आज भी गाँव में कोई भी शुभ कार्य हो तो उनके स्थल पर जाकर आशीर्वाद लेना परंपरा का हिस्सा बना हुआ है। उनके गाँव में आगमन को लेकर अलग-अलग मत हैं, कुछ का मानना है कि वे नरौनी परिवारों के गाँव में बसने के समय ही आए जबकि अन्य कहते हैं कि वे पहले से ही यहाँ थे और नरौनी लोगों के आगमन के बाद उन्होंने समाधि ली।
उनकी समाधि स्थल जो नारेंदरपुर गढ़ी के निकट स्थित है आज भी ग्रामवासियों के सौहार्द और श्रद्धा का प्रतीक है। साम्प्रदायिक सद्भाव को सुदृढ़ बनाए रखने हेतु गाँव के लोगों ने इस स्थल की मरम्मत की और मजार का पुनर्निर्माण भी किया। उनके मूल स्थान और आगमन की तिथि स्पष्ट नहीं है, परंतु उनकी स्मृति और उपस्थिति ग्राम जीवन में आज भी जीवंत बनी हुई है।
एक प्रमुख मौखिक परंपरा के अनुसार जब नरौनी राजपूत समुदाय में बसने के लिए आया तब सहबुढ़न साईं यहाँ के प्रभावशाली व्यक्ति थे और उनके पास भूमि भी थी। इस संदर्भ में यह रोचक आख्यान भी सुनाया जाता है कि जब नरौनी परिवार यहाँ स्थापित होने आए तब उन्होंने सहबुढ़न साईं से पूछा कि “क्या आप युद्ध करेंगे या आत्मसमर्पण?” इस पर सहबुढ़न साईं ने उत्तर दिया-“ मुझे समाधि लेने दीजिए” -—“” नरावनी परिवार ने उनकी इस अंतिम इच्छा को सम्मानपूर्वक स्वीकार किया और गाँव वासियों की सहायता से उन्हें समाधि दी गई।



