डॉ फणीश सिंह
डॉ फणीश सिंह अपने गाँव नरेन्द्रपुर के विशिष्ट व्यक्ति थे। उनका जन्म 3 दिसम्बर 1940 में गाँव नरेन्द्रपुर में हुआ। उन्होंने 1955 में महात्मा गाँधी इंटरमीडिएट कॉलेज, सरविनया, देवरिया से मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की। 1958 में उन्होंने बी. एन. कॉलेज पटना से इंटरमीडीएट किया और 1960 में वहीं से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद रांची विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई कर 29 अगस्त 1967 को ऐड्वोकेट घोषित हुए। 1997 तक उन्होंने सक्रिय वकालत की और खूब यश्स्वी हुए। इसी समय से वे नाना प्रकार की साहित्यिक गितिविधयों से जुड़े और उनको हर ओर प्रसारित करने का काम भी किया।
अपने गाँव नरेन्द्रपुर के कल्याण हेतु उन्होंने अनेक प्रयास किए, जिनमें, शिक्षा के लिए शहीद उमाकांत सिहं उच्च विद्यालय, संगीत विद्यालय, अस्पताल (जिसकी शुरुआत प्राथमिक उपचार केंद्र से हुई लेकिन आगे जाकर यह सुविधायुक्त अस्पताल बना) का निर्माण करवाया तथा ये सारे संस्थान सुचारु रूप से संचालित हों इसकी सजग व्यवस्था कारवाई।
इसके अतिरिक्त गाँव की सड़कों, तथा पर्यावरण को व्ययवस्थित करने के सरकारी एवं व्यक्तिगत स्तर पर अनेक उपाय किए; अनेक पेड़ लगवाए एवं हाशिये के समाज के जीवन को बेहतर करने के लिए रोज़गार निर्मित करने का प्रयास किया। मन एवं वचन से वे गाँधीवादी विचारों के समर्थक थे।
उनके प्रयासों से नरेन्द्रपुर गाँव का 300 वां स्थापना दिवस बहुत धूमधाम से मनाया गया। नरेन्द्रपुर के इतिहास को लोगों ने पुनः जाना और उसे अपने लोक मानस का हिस्सा बनाया। उनकी देश विदेश की विविध यात्राओं ने उन्हें अत्यंत समृद्ध किया और उन्होंने इस विषयक अनेक किताबें लिखीं।
इतिहास एवं साहित्य के वे विलक्षण पाठक, संरक्षणकर्ता एवं लेखक थे। उन्होंने 1990 में ए. एन. कॉलेज, मगध यूनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम ए किया और फिर 1999 में पी एच डी भी पूरा किया। उनकी थीसिस, ”प्रेमचंद और गोर्की के साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन“ को बहुत सराहना मिली। उन्होंने ‘स्वतंत्रता संघर्ष और भारत की संरचना, ‘, ‘लू शुन की लोकप्रिय कहानियाँ,’ ‘कितने हिंदुस्तान’, ‘1942 की अगस्त क्रांति’, ‘कथावली (आख्यान 1 -7)’, ‘हिन्दी के आंचलिक उपन्यास और उपन्यासकार’, ‘दक्षिण पूर्व एशिया पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव’, ‘विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रेम कहानियाँ, वैशाली का इतिहास, ‘जैसी अनेक महत्वपूर्ण किताबों में संचयन, सम्पादन एवं लेखन किया। देश के प्रसिद्ध लेखकों एवं इतिहासविदों ने उनकी किताबों का स्वागत किया और उन्हें गंभीर विचार विमर्श का हिस्सा बनाया।
एक प्रखर सामाजिक कार्यकर्ता एवं संस्कृतिकर्मी के रूप में उनकी प्रसिद्धि चारों ओर फैली। वे इप्टा के आजीवन सदस्य बने रहे और कौमी एकता ट्रस्ट के तहत छपने वाली पत्रिका कौमी एकता संदेश के आजीवन संपादक भी। वे इंडो जी डी आर फ्रेंडशिप एसोसिएशन के बिहार स्टेट काउंसिल के 1972-92 तक महासचिव रहे। इसके अतिरिक्त वे ऐप्सो राष्ट्रीय काउंसिल दिल्ली के सचिव, ऐप्सो बिहार राज्य काउंसिल के महासचिव एवं 2007 के ऐप्सो राष्ट्रीय बैठक पटना के संयोजक रहे। वे 1983 एवं 1986 में ऐप्सो के भारतीय प्रतिनिधि के रूप में कोपेनहेगेन विश्व शांति सम्मेलन में हिस्सा लेने गए। सुभद्रा जोशी एवं देशराज गोवल द्वारा बनई गयी सांप्रदायिकता विरोधी कमिटी के वे 35 वर्षों तक सदस्य बने रहे। उनके द्वारा सोनेपुर में बनवाए गए संग्रहालय में 1942 की राष्ट्रीय एवं स्थानीय छवियाँ प्रदर्शित हैं। उनकी पत्नी कविता सिंह के पिता महेश्वर सिंह 1942 के अँग्रेज़ों के खिलाफ छिड़े, भारत छोड़ो आंदोलन में शहीद हुए थे, उनकी स्मृति को भी इस संग्रहालय में संरक्षित किया गया है।
फणीश सिंह के अनेक ऐसे अचर्चित, अघोषित कार्य भी रहे हैं जिनसे साहित्य एवं समाज समृद्ध हुआ है। उन्हें आज भी न सिर्फ गाँव में बल्कि बिहार एवं उनसे जुड़े लोग देश विदेश में जहां भी रहते हों, बहुत आदर एवं प्यार से याद करते हैं।