उमाकांत प्रसाद सिंह

11 अगस्त 1942 के दिन पटना सेक्रेटेरियट पर भारत का झण्डा फहराकर आंदोलन करने वाले छात्रों में नरेन्द्रपुर के उमाकांत सिंह भी थे। बचपन से देश प्रेम का जज्बा उनमें कूट कूट कर भरा था। वे गाँव की रक्षा करने के लिए रात-रात भर बालकों का जत्था बना पहरेदारी करते थे।

रामगोविंद सिंह, राजेन्द्र सिंह, सशीधर झा सतीश प्रसाद झा, जगतपति कुमार और देविपद चौधरी के साथ मिलकर इन्होंने अंग्रेज़ सरकार के आदेश के खिलाफ पटना सेक्रेटेरियट पर झण्डा फहराने का प्रयास किया। उमाकांत सिंह नीम के एक पेड़ पर चढ़कर प्रयास करने लगे जब ब्रिटिश पुलिस ने गोली चला दी। तिसपर भी वे रुके नहीं। गोली लगने के बाद जब वे दौड़ कर अस्पताल पहुंचे तो डाक्टर से उन्होंने सवाल किया, कि इन्हें गोली कहाँ लगी है? पीठ पर तो नहीं? क्योंकि उनके मन में था कि पीठ पर गोली खाने वाले भगोड़े होते हैं। जब डाक्टरों ने इन्हें आश्वस्त कर दिया कि ऐसा नहीं है तब वे अपना इलाज कराने को तैयार हुए। चूंकि खून बहुत बह चुका था और उनकी जोड़ (ब्लड ग्रुप) का खून नहीं मिला तो उनको बचाया नहीं जा सका। इस तरह देश के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी।

उनके पुत्र चन्द्रकीर्ति सिंह उस समय सिर्फ आठ माह के थे।

इनके इस बलिदान के सम्मान में पटना में न सिर्फ शहीद स्मारक बना बल्कि नरेन्द्रपुर में भी उनकी प्रतिमा को स्थापित किया गया। आज भी 15 अगस्त एवं 26 जनवरी को नरेन्द्रपुर में होने वाले सभी आयोजनों से पहले शहीद उमाकांत सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें याद किया जाता है।