नरेन्द्रपुर
नरेन्द्रपुर गाँव का इतिहास लगभग तीन शताब्दियों पुराना है। उपलब्ध दस्तावेज़ों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, इस गाँव की स्थापना सन 1715 में हुई थी। इसी आधार पर सन 2015 में गाँव के 300 वर्ष पूरे होने पर ‘स्थापना समारोह’ मनाया गया। स्थानीय परंपरा के अनुसार, स्थापना से पूर्व यह क्षेत्र स्थायी बसाहट वाला क्षेत्र नहीं था। स्थापना के प्रारंभिक चरण में, मध्यप्रदेश के नरवरगढ़ से बाबू शक्ति सिंह और उनके वंशज इस क्षेत्र में आकर बसे। उनके वंशजों ने इस भूभाग में स्थायी निवास स्थापित किया और सामाजिक संगठन की नींव रखी। इस गाँव का नाम आरंभ में ‘नरीनपुर’ था, जो कालांतर में परिवर्तित होकर ‘नरेन्द्रपुर’ हो गया। आज भी बोलचाल में गाँव के लोग इसे नरीनपुर कहते हैं।
धीरे-धीरे, नरौनी वंश के लोगों ने यहाँ ठोस सामाजिक और प्रशासनिक ढाँचा खड़ा किया। शुरुआती दौर की सीमित क्षेत्रफल वाली यह ज़मीन, वंशजों की वृद्धि और कृषि विस्तार के साथ बढ़ती गई। विभिन्न समुदायों के लोग यहाँ आवश्यकतानुसार बसे जिससे गाँव में सामाजिक विविधता और समरसता का संचार हुआ। यह गाँव अपनी बसाहट के आरंभिक वर्षों में ज़मींदारी केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित था, और यहाँ सामंती व्यवस्था के कई सामाजिक-आर्थिक आयाम देखने को मिलते थे। लेकिन आज नरेन्द्रपुर, सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक दृष्टि से एक सक्रिय और प्रगतिशील गाँव के रूप में प्रसिद्ध है।
भौगोलिक स्थिति
यह गाँव जीरादेइ से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर जीरादेई – आन्दर मार्ग पर बसा हुआ है। यह गाँव 26.15 डिग्री अक्षांश एवं 84.26 डिग्री देशांतर पर स्थित है। राजस्व के हिसाब से यह गाँव नरेन्द्रपुर- क तथा नरेन्द्रपुर – ख (बाबू भटकन) के रूप में स्थापित है। यह गाँव तीन टोलों (दक्खिन पट्टी ,पूरब पट्टी एवं पकड़ी पट्टी) में बंटा हुआ है और लगभग 935 बीघा क्षेत्र में बसा हुआ है । यहाँ 3 तालाब बने हुए हैं।
जनसांख्यकी एवं सामाजिक व्यवस्था
2011 के सेन्सस के अनुसार नरेन्द्रपुर गाँव की कुल जनसंख्या 4,388 है, जिसमें पुरुषों की संख्या 2,225 तथा महिलाओं की संख्या 2,163 है। यहाँ कुल 615 परिवार निवास करते हैं। साक्षरता की दृष्टि से देखा जाए तो गाँव में कुल 2,548 लोग साक्षर हैं, जिनमें पुरुषों की संख्या 1,512 तथा महिलाओं की संख्या 1,036 है। वहीं 1,840 व्यक्ति निरक्षर हैं, जिनमें 713 पुरुष और 1,127 महिलाएँ शामिल हैं। यह आँकड़े दर्शाते हैं कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं की साक्षरता दर अभी भी कम है।
गाँव की कुल कामकाजी जनसंख्या 1,395 है। इनमें से 1,047 पुरुष तथा 348 महिलाएँ हैं। मुख्य कामगारों की संख्या 468 है जबकि 927 लोग सीमांत कामगार हैं। कार्य के स्वरूप पर दृष्टि डालें तो 57 कृषक, 269 कृषि मज़दूर, 5 घरेलू उद्योग से जुड़े उद्यमी तथा 137 अन्य प्रकार के कार्य करने वाले लोग हैं।
सामाजिक दृष्टि से यहाँ विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग साथ-साथ निवास करते हैं। राजपूतों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि यादव, हरिजन तथा अन्य जातियों की भी अच्छी खासी उपस्थिति है। हिन्दू और मुसलमान दोनों समुदायों के लोग यहाँ रहते हैं और आपसी सहयोग से सामाजिक जीवन यापन करते हैं।
कृषि
नरेन्द्रपुर गाँव की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है। जनगणना आँकड़ों के अनुसार गाँव में ज़्यादातर कृषक परिवार हैं। अधिकांश कृषक सीमांत और लघु कृषक वर्ग से आते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ परिवार कृषि मज़दूरी पर निर्भर हैं जो दर्शाता है कि बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार भूमिहीन अथवा अल्प-भूस्वामी हैं और अपनी आजीविका के लिए मजदूरी करते हैं।
गाँव में खेती योग्य भूमि पर मुख्य रूप से धान, गेहूँ और तिलहनी (सरसों) की फसलें उगाई जाती हैं। कुछ परिवार अपनी घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए फल एवं साग-सब्जी की वाटिका भी लगा लेते हैं।
कृषि संसाधनों की दृष्टि से यहाँ मिट्टी बलुआई दोमट है, जो धान और गेहूँ की खेती के लिए उपयुक्त है। सिंचाई के लिए करीब 50 बोरिंग और एक सरकारी ट्यूबवेल उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त कई किसान ट्रैक्टर और आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग करते हैं।
ग्रामीण आजीविका में कृषि के साथ-साथ अन्य श्रम कार्यों और मजदूरी का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। कुछ परिवार मुर्गी-मवेशी पालन और सब्ज़ियों की खेती जैसे वैकल्पिक साधनों से भी आय अर्जित करते हैं।
आधारभूत सुविधाएं
नरेन्द्रपुर पंचायत में, नरेन्द्रपुर, खेमभटकन और बड़हुलिया गाँव शामिल हैं।
यहाँ प्राथमिक उपचार व प्रसव सेवाओं से युक्त सरकारी अस्पताल, स्पीड पोस्ट व बैंकिंग सुविधाओं वाला पोस्ट ऑफिस, केसीसी सुविधा सहित उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक, विवाह भवन, पुस्तकालय, गांधी स्मृति केंद्र, किसानों के लिए पैक्स संस्था, पंचायत कार्यालय, बड़हुलिया स्थित सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान एवं अधिकतर घरों में शौचालय हैं।
पेयजल हेतु हैंडपंप व आर ओ, पक्के रास्ते, औसतन 20 घंटे की बिजली आपूर्ति, तथा तक्षशिला एजुकेशनल सोसाइटी द्वारा संचालित परिवर्तन संस्थान में शिक्षा, कृषि, महिला सशक्तिकरण, रंगमंच, खेल, खादी व आजीविका से जुड़ी इकाइयाँ मौजूद हैं। आजीविका की इन इकाइयों में सूत कताई, बुनाई-सिलाई, पैकिंग और विपणन होता है।
सबरंगी हैंडमेड प्रा. लि. वह केंद्र है जहाँ से विपणन होता है, साथ ही यह पारंपरिक कला, डिज़ाइन, प्रशिक्षण और महिला शिल्पकारों द्वारा तैयार किए गए हस्तनिर्मित उत्पादों का संगठित केंद्र भी है। इसके अंतर्गत सबरंगी स्टिचिंग यूनिट, जहाँ महिला शिल्पकार सिलाई कार्य करती हैं, तथा नॉर्थ बिहार वीविंग यूनिट, जो स्थानीय बुनकरों को आजीविका से जोड़ने का कार्य करती है, सक्रिय रूप से संचालित हो रही हैं। इसके अलावा यहाँ किसान सेवा केंद्र, संगत भवन, रंग करघा और उड़ान स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं।
यहाँ के गाँव के मंदिरों एवं मस्जिदों की शोभा देखते ही बनती है। संथू मार्ग पर स्थित मुक्तिधाम, एक सामुदायिक अंत्येष्टि स्थल है जिसने गाँव वालों को जीवन चक्र पूरा करने के बाद शारीरिक मुक्ति की सुविधा भी प्रदान की है।
शिक्षा
शैक्षणिक व्यवस्था के अंतर्गत यहाँ पर एक सरकारी प्राइमरी स्कूल एवं जूनियर हाई स्कूल तथा दो प्राइवेट स्कूल है, और तीन आंगनबाड़ी केंद्र है जहाँ ट्रस्ट संचालित शहीद उमाकांत उच्च विद्यालय है जहां पर हाई स्कूल तक की शिक्षा दी जाती है।यहाँ एक संगीत महाविद्यालय है जहाँ विधिवत संगीत की शिक्षा दी जाती है।
पर्व-त्योहार
नरेन्द्रपुर ग्राम में पर्व-त्योहार न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं बल्कि सामूहिकता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम भी हैं। यहाँ प्रायः सभी प्रमुख भारतीय त्योहार मनाए जाते हैं किंतु ग्राम समुदाय में होली, दशहरा तथा ताजिया विशेष रूप से उल्लास के साथ मनाया जाता है।
होली
होली ग्राम का सबसे रंग-बिरंगा और सामूहिकता से भरपूर उत्सव है, जहाँ पूरे गाँव में पारंपरिक होली गीत, ढोलक-मंजीरे और हँसी-मजाक का माहौल बनता है। पहले के समय करीब एक हफ्ते 10 दिन पहले से लोग शाम में होली के गीत गाकर इस त्योहार को मानते थे अब ये परंपरा थोड़ी कम होती जा रही हैं। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं बल्कि परस्पर मेल-जोल और सौहार्द का प्रतीक है।
दशहरा
दशहरा पर्व नरेन्द्रपुर ग्राम में अत्यंत श्रद्धा, भव्यता और सामूहिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह केवल धार्मिक आस्था का नहीं बल्कि सांस्कृतिक एकता और सामाजिक सहभागिता का भी पर्व बन चुका है। ग्राम में स्थित शिवमंदिर के समीप एक भव्य पंडाल की स्थापना की जाती है जिसमें माँ दुर्गा की प्रतिमा को स्थापित कर विधिवत् दस दिवसीय पूजा-अर्चना की जाती है।
दशहरा
इन दस दिनों के दौरान ग्रामीणजन विभिन्न अनुष्ठानों, आरती, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। दशमी के दिन शस्त्र पूजा की परंपरा भी निभाई जाती है जो विशेष रूप से नरौनी परिवार की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग रही है। इस अवसर पर पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों की पूजा कर शक्ति और धर्म की विजय का स्मरण किया जाता है।
दशहरा के दिन पूरे गाँव में उत्सव जैसा वातावरण होता है—बच्चों, युवाओं और वरिष्ठजनों की समान भागीदारी इस पर्व को एक जीवंत सामाजिक आयोजन में बदल देती है। नरौनी परिवार इस आयोजन में ऐतिहासिक रूप से नेतृत्वकारी भूमिका निभाता आया है, जो पीढ़ियों से इस परंपरा को जीवित रखे हुए है।
मुहर्रम
नरेन्द्रपुर ग्राम की विविध सांस्कृतिक विरासत में मुहर्रम एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है जो यहाँ ताजिया के रूप में पूरे सम्मान और सौहार्द के साथ मनाया जाता है। यह आयोजन गाँव में धार्मिक एकता, आपसी सद्भाव और गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक माना जाता है।
मुहर्रम के अवसर पर गाँव में ताजिया निर्माण की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। ताजिया की सजावट, मातमी जुलूस, नौहों का गायन और श्रद्धा-भाव से किया गया आयोजन पूरे ग्राम समुदाय को एक सूत्र में बाँधता है। विशेष बात यह है कि इसमें न केवल मुस्लिम समुदाय, बल्कि हिन्दू समुदाय के लोग भी सहभागी बनते हैं जो नारेंदरपुर की समावेशी संस्कृति को दर्शाता है।
ताजिया जुलूस गाँव की गलियों से होते हुए निर्धारित स्थान तक पहुँचता है जहाँ विधिपूर्वक उसका विसर्जन किया जाता है। इस दौरान हज़रत इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद किया जाता है, और शांति, सहिष्णुता व न्याय के मूल्यों का संदेश दिया जाता है।
यह आयोजन, धार्मिक सीमाओं से परे जाकर, गाँव में परस्पर सम्मान, संवाद और सहभागिता का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। नरौनी परिवार सहित समस्त ग्रामवासी इस आयोजन में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सहयोग करते हैं जो ग्राम की सामाजिक एकता को सशक्त बनाता है।
छठ पूजा
इसके अतिरिक्त, छठ पूजा भी गाँव में गहन श्रद्धा और परंपरा के साथ मनाई जाती है, विशेषकर अन्य समुदायों द्वारा। यद्यपि नरौनी परिवारों में यह पूजा पारंपरिक रूप से प्रचलित नहीं रही है, तथापि ग्राम स्तर पर होने वाले आयोजनों में उनका सहयोग, सहभागिता और सामाजिक एकजुटता सदैव बनी रहती है।
नरेन्द्रपुर ग्राम के ये समस्त पर्व चाहे धार्मिक हों या सांस्कृतिक न केवल आस्था की अभिव्यक्ति हैं बल्कि पारिवारिक रिश्तों, सामुदायिक एकता और सामाजिक संवाद को भी सुदृढ़ करते हैं। ये परंपराएँ पीढ़ी दर पीढ़ी इस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और ग्राम को एक जीवंत, संवेदनशील और समरस समाज के रूप में संजोए रखती हैं।













