इतिहास
स्थानीय बोलचाल में कहे जाने वाले नरौनी राजपूतों अर्थात नरावनी समुदाय का इतिहास मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक नरवर किले से जुड़ा है। पूर्व काल में यह स्थल न केवल उनकी सांस्कृतिक विरासत, शक्ति, और सुरक्षा का गढ़ था बल्कि उनके सामाजिक और धार्मिक जीवन का भी महत्वपूर्ण केंद्र था। इसलिए इस समुदाय के जो लोग यहाँ से देश के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर बसे और वे नरावनी (नरौनी) कहलाये।
प्रवास उनके लिये नई चुनौतियों और अवसरों की शुरुआत साबित हुआ। अपनी जड़ों से जुड़े रहने के बावजूद, नरौनी समुदाय ने अपने पारंपरिक रिवाजों के संग, स्थानीय संस्कृतियों और रीति-रिवाजों को अपनाया जिससे उनकी परंपराएं और समृद्ध हुईं।
इस प्रकार, नरौनी समुदाय की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान निरंतर विकासशील बनी रही और उनकी पारंपरिक विरासत तथा नए अनुभवों के बीच एक संतुलन बनाती रही। उनकी यह यात्रा न केवल उनके इतिहास का दस्तावेज़ है, बल्कि उनके सामंजस्य कौशल और आत्मिक मजबूती का प्रमाण भी है।
नीचे आप इस समृद्ध इतिहास, नरवर किले की महत्ता, प्रवास की कथा और विविध रीति-रिवाजों के बारे मे विस्तार से जानेंगे।
नलापुरा जिसका लोकप्रिय नाम नरवर है, मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक किला क्षेत्र है। परंपरागत भारतीय मिथकों के अनुसार इसका नाम राजा नल पर है जो मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पुत्र कुश के वंशज थे। इससे नरवर महाभारत और भवभूति द्वारा रचित पारम्परिक साहित्य मालती और माधव में उल्लेख पाता है। नरवर अपने आरंभिक काल से नागा, गुप्ता, तोमर एवं कछवाहा राजपूतों के संरक्षण में खूब फला फूला। बाद में मराठा, मुग़ल और ब्रिटिश साम्राज्यवादी ताकतों ने भी कई बार इसपर कब्ज़ा करने की कोशिश की। इससे नरवर के स्थापत्य और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत बहुत मिलिजुली और समृद्ध हुई।
17वीं शताब्दी के बाद राजस्थान के राजवंशों का प्रामाणिक अध्ययन (1829 ईसवीं में) कर्नल जेम्स टॉड ने किया। उन्होंने कछवाहा वंश के विवरण में स्पष्ट उल्लेख किया, _”राजा नल ने रोहतास से विस्थापित होकर संवत 351 में नरवर शहर या पौराणिक नरवर बसाया।”
ए. कनिंघम ने 1861 में लिखा, _“वर्तमान नरवर के प्रसिद्ध दुर्ग को राजा नल ने बसाया था।”
स्थापत्य
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित नरवर का किला एक ऊबड़खाबड़ पहाड़ पर बना हुआ है। 8 कि. मि. वर्गक्षेत्र में फैला यह किला हिन्दू एवं इस्लामी स्थापत्य के मेलजोल का नमूना है। किले के चारों ओर मजबूत पत्थर की दीवारें हैं। इसमें प्रवेश करने के लिए कई दरवाज़े हैं।
आलमगीर दरवाज़ा (पिसनहारी दरवाज़ा) – इसे औरंगज़ेब ने बनवाया था। यह मुग़ल स्थापत्य शैली में बना है।
हवा पौर (गौमुखी दरवाज़ा) – सन 1800 में इसे गवर्नर दौलत राव सिंधिया ने बनवाया था।
सय्यदों का दरवाज़ा – यह शेरसाह सूरी के सेनापति दिलावर खान की मज़ार तक जाता है। इस हिस्से में सैन्य एवं धार्मिक शैलियों का समावेश है।
महल
किला परिसर में कई महल शामिल हैं। ये महल शासक वंश की भव्यता और उनकी जीवनशैली का प्रतीक हैं।
राजा महल – अपने विशाल प्रांगणों, भव्य दीर्घाओं और बारीक नक्काशीदार स्तंभों के लिए उल्लेखनीय है। इसका सममितीय डिज़ाइन उपयोगिता और शाही वैभव का संतुलन दर्शाता है।
रानी दमयन्ती महल – रानी दमयंती के नाम पर निर्मित यह महल सुंदर नक्काशियों और झरोखों से सुसज्जित हैं। किले के चारों ओर फैले प्राकृतिक परिदृश्य का यह मनोहारी अवलोकन करवाता हैं।
छिप महल – इस दो-मंज़िला महल में स्तंभों वाले गलियारे और घिरे हुए प्रांगण हैं। इसके कई स्तंभ प्राचीन मंदिरों से लेकर पुनः उपयोग में लाये गए हैं जो किले के भीतर घट रहे सांस्कृतिक परिवर्तनों की परतों को उजागर करते हैं।
चक्की महल – इस भवन के एक कोने में पारंपरिक अनाज चक्की स्थित है जो संरक्षित अवस्था में दिखाई देती है। ऐसा प्रतीत होता है कि कक्ष को मरम्मत के बाद पुनर्स्थापित किया गया है। यहां मिल स्टोन और उसके नीचे आटे को एकत्र करने की व्यवस्था को आज भी देखा जा सकता है ।
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इन पत्थरों को चलाने के लिए मानव श्रम का प्रयोग किया गया था या पशुओं की सहायता ली जाती थी।
धार्मिक स्थल
यहाँ अनेक मंदिरों एवं मस्जिदों के अवशेष मिलते हैं। यह दर्शाता है कि यह स्थान अनेक धर्मों एवं समुदायों का रहन स्थल रहा है।
13वीं शताब्दी का विष्णु मंदिर, नागर शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है जिसमें ऊँचा शिखर और बारीक नक्काशी वाली पत्थर की दीवारें हैं। यहाँ स्थित कुछ प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार कर आज भी उनमें पूजा-अर्चना की जाती है और विशेष पर्वों के अवसर पर मेले आयोजित किए जाते हैं। मस्जिद सिकंदर लोदी द्वारा बनवाई गयी थी जिसमें स्थानीय प्रभाव दिखलाई पड़ते हैं।
भारतीय किलों में अद्वितीय, नरवर किले में 18वीं शताब्दी का एक रोमन कैथोलिक चैपल और कब्रिस्तान भी मौजूद है। इसे आर्मीनियाई बॉर्बन परिवार द्वारा बनवाया गया था, जिन्होंने यहाँ शरण ली थी।
जल संरक्षण संरचना
नरवर किले में जल संरक्षण के लिए कुंड, बावड़ियाँ और जलाशय जैसी सुव्यवस्थित संरचनाएँ विकसित की गई थीं। यह सारे विलक्षण निर्माण, तत्कालीन जल प्रबंधन प्रणाली की दक्षता और पर्यावर्णीय समझ को दर्शाते हैं।
मकर ध्वज टंकी – पत्थरों से बनी हुई यह पानी टंकी 300 स्क्वेरफुट में बनी हुई है और 35 फुट गहरी है। यह क्षेत्र की पानी की आवश्यकताओं की पूर्ति लगातार करती थी।
बावड़ी – वर्षा के पानी को संरक्षित कर सूखे के दिनों में इस पानी का इस्तेमाल किया जाता था।
भूमिगत चैनल – यह अभियांत्रिकी कौशल के अद्भुत नमूने थे और किले के हर भाग में पानी पहुँचाने का काम करते थे।
शिल्पकारी की शैलियाँ
यहाँ शिल्पकारी बहुत विविधता लिये हुए दिखलायी पड़ती है।यहाँ फूल-पत्तियों और ज्यामितीय नमूनों का मिश्रण,मिथकीय कथाओं का उत्तकीर्णन,आलंकारिक दरवाज़े और खंभे दिखलाई पड़ते हैं। अनेक छतरियाँ, तथा पेविलीयन, सूफी मजारें और दिलावर खान का मकबरा यहाँ मौजूद है। यह अनूठी बात है कि नरवर में 18 वीं शताब्दी का एक कैथोलिक चैपल और कब्रगाह भी मिलते हैं जो शायद आर्मेनियाई बर्बन समुदाय ने बनवाए थे जब उन्होंने कभी यहाँ शरण ली थी।
नरवर किले में कई छुपे हुए सुरंग मार्ग पाए जाते हैं, जो शाही परिवार और किले के रक्षकों को सुरक्षित रूप से बाहर निकलने का मार्ग प्रदान करते थे। किले की बस्तियाँ और पहरेदारी मीनारें रणनीतिक रूप से इस तरह से स्थित हैं कि वे आसपास के विस्तृत मैदानों का स्पष्ट दृश्य प्रस्तुत करती थीं, जिससे संभावित खतरों का समय रहते पता चल जाता था।
किले के परिसर में विभिन्न मकबरे और स्मारक भी मौजूद हैं, जो इसकी समृद्ध ऐतिहासिक परतों को दर्शाते हैं। सूफी संतों से जुड़े मकबरे छोटे स्तंभों और दीपक जलाने के लिए बनाए गए खांचों से सुसज्जित हैं, जो आध्यात्मिक आस्था का प्रतीक हैं। इसके अलावा, सैय्यदों का दरवाज़ा के पास स्थित दिलावर खान का सफेद रंग से रंगा हुआ मकबरा भी किले की सांस्कृतिक विरासत में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
कैसे पहुँचें
आज नरवर किला पहुँचने के लिए सुगम एवं सुरक्षित सड़क मार्ग उपलब्ध हैं ।शिवपुरी (मध्य प्रदेश) और झांसी (उत्तर प्रदेश) से यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है। शिवपुरी से नरवर की दूरी लगभग 45 किलोमीटर है, जबकि झांसी से यह लगभग 85 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
आप इन दोनों शहरों से राज्य यातायात के वाहनों के अलावा निजी वाहन भी किराए पर लेकर नरवर कस्बे तक पहुंच सकते हैं और फिर किले की चढ़ाई शुरू कर भ्रमण कर सकते हैं।
नरौनी लोग अपने आप को सूर्यवंशी, परिहार राजपूत भी कहते हैं। इनके समुदाय में अधिकतर कश्यप गोत्र पाया जाता है। समुदाय के कुछ सदस्य अपने को वशिष्ठ गोत्र का भी बताते हैं। इनके आख्यान बताते हैं कि मध्यप्रदेश के नरवरगढ़ किले से चलकर नरौनी समुदाय के कुछ लोग, पहले उत्तर प्रदेश में, बलिया ज़िले के बांसडीह, सुखपुरा गाँव और आस पास के गाँव में बसे फिर उन्ही में से परिवार के कुछ लोग, सरयू नदी पार कर वे सिवान के असांव आए और वहीं से इनकी शाखाएं सिवान के 11 गाँव फैलीं।
कुछ कथाएं इनकी शाखाओं को नरवरगढ़ के बाद धार नागरी, उज्जैन और फिर लंगूर गढ़ी उत्तराखंड के भैरव गढ़ी मंदिर और आस पास के गाँव तक ले जाती हैं और वहीं से इनका भारत के पूर्वी क्षेत्र में प्रसार बताया जाता है। आज भी नरौनी राजपूत उत्तराखंड के इस क्षेत्र मे अधिक संख्या मे पाए जाते हैं एवं देश के विभिन्न हिस्सों में बसे हुए हैं, जिनमें बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड प्रमुख हैं।
श्री भैरव गढ़ी मंदिर, लंगूरगढ़ी, उत्तराखंड
ऐसी मान्यता है कि इस वंश के दो अग्रज भाई, दुर्गा देव और लबंग देव, तीर्थयात्रा पर निकले तो उन्होंने अस्त्र-शस्त्र धारण किए। उनके दो उद्देश्य थे, चोर-डाकुओं से सुरक्षा और जहाँ शासक दुर्बल हों वहाँ शक्ति प्रदर्शन कर अपना अधिकार स्थापित करना। वे कहते थे “यह पृथ्वी शक्तिशाली लोगों की है।” इसी भाव के साथ वे नए क्षेत्रों में स्थापित होते गए।
बांसडीह में नरौनी वंश के सबसे बड़े भाई ने एक गढ़ का निर्माण किया, जो इस वंश की पूर्वी उत्तर प्रदेश में बसाहट का प्रारंभिक केंद्र बना। इस गढ़ से राजागाँव खरौनी तथा अन्य आसपास के गाँवों में नरौनी राजपूतों की शाखाओं का विस्तार हुआ। इस संबंध में एक लोककथन आज भी प्रचलित है – “राजा गाँव खरौनी, जहाँ बसे तीन सौ घर नरौनी।”
देवी मंदिर, ग्राम सुखपुरा, बलिया, उत्तर प्रदेश
वंश के दूसरे भाई सुखपुरा ग्राम पहुँचे और वहाँ उन्होंने अपनी गढ़ी स्थापित की। यही स्थान बाद में चार प्रमुख शाखाओं का आधार बना, जिनमें विक्रम राय का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सुखपुरा ग्राम आज भी नरवानी वंश के कुलगुरु की स्थायी निवासस्थली के रूप में जाना जाता है, जहाँ पारिवारिक कुल परंपराएँ कुल गुरु के यहाँ संरक्षित हैं।
विक्रम राय के वंशजों में वंशीधर राय सर्वाधिक प्रसिद्ध हुए, जो अपने अद्वितीय पराक्रम और युद्ध-कौशल के लिए विख्यात थे। उनके नौ पुत्र हुए जो सभी वीरता और सैन्य दक्षता में अपने पिता की परंपरा के अनुरूप थे। इन्हें लेकर एक लोककथन आज भी कहा जाता है – “वंशीधर के वंश में नवो भय प्रचंडा।”
वंशीधर राय का इतिहास नरेन्द्रपुर परिवार के गौरव का आधार है। वंशीधर राय ने जब सिवान-छपरा क्षेत्र में अपनी शक्ति बढ़ाई, तब सरयू (घाघरा) नदी पर स्थित चैनपुर राज, जिस पर भूमिहार जाति के राजा शासन करते थे, तोमर राजपूतों के हमले से त्रस्त बना हुआ था।इसी संबंध में चैनपुर राज ने वंशीधर राय से सहायता मांगी। वंशीधर राय ने तोमरों को हराकर न केवल चैनपुर राज को सुरक्षित किया बल्कि उनकी पूर्व में लूटी गई जमीन भी वापस दिलाई। इसके उत्तर में चैनपुर राज ने वंशीधर राय को आंदर और पंचलख परगना भेंट में दे दिया।
वंशीधर राय के नौ पुत्रों ने विभिन्न स्थानों पर गढ़ियाँ स्थापित कीं भरथुई, जामापुर, भरथुआ, छितौर, चितनपुर, लोहगजर, नरेन्द्रपुर, सरहरवा, सेलारपुर और विष्णुपुर। इस प्रकार वंशीधर राय के वंशजों की उपस्थिति ग्यारह गाँवों में दर्ज है।
वीरा राय, वंशीधर राय के सबसे छोटे पुत्र थे। उनके वंशजों का निवास आसांव क्षेत्र में था, जिस पर उस समय अवध के नवाब और अंग्रेज़, दोनों अपना अधिकार जताते थे। किंतु वीरा राय किसी को भी कर नहीं देते थे। उनके देहावसान के बाद सत्ता उनके छोटे पुत्र दिरगा राय ने संभाली। दिरगा राय भी किसी प्रकार का कर नहीं देते थे।
इस कारण अंग्रेज़ों ने उनके विरुद्ध एक फौजी टुकड़ी भेजी। जब वह टुकड़ी मैरवा में पड़ाव डाले हुए थी तब रात्रिकाल में नरौनी पक्ष ने उस पर आक्रमण किया और लड़ाई में विजय प्राप्त की। लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि कुछ अंग्रेज़ सैनिकों के सिर काटकर गढ़ पर टांगे गए। इसके बाद अंग्रेजों ने एक बड़ी सैन्य टुकड़ी भेजी। इसी बीच दिरगा राय लकवे की बीमारी से पीड़ित हो गए और उन्हें अपना गढ़ छोड़ना पड़ा। किन्तु कुल के कुछ ने अंग्रेज़ों को उनके प्रस्थान की सूचना दे दी। रास्ते में अंग्रेज़ी सैनिकों ने उन्हें घेरकर गिरफ्तार कर लिया। कुछ मौखिक परंपराओं के अनुसार, उन्हें ‘काला पानी’ की सज़ा दी गई। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने ‘आंदर’ और ‘पचलख’ परगना पर अधिकार कर लिया। लेकिन उन्होंने नरौनी वंश के लोगों को गाँवों से नहीं निकाला, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि यदि इन परिवारों को उनके घरों से निकाला गया, तो वे जंगलों में जाकर, संगठित होकर अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध युद्ध छेड़ सकते हैं, जिससे प्रशासन को गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ सकता था।
नरेन्द्रपुर में बसाहट को लेकर की कई और रोचक कथाएँ भी प्रचलित है। एक कथा के अनुसार, लोहगजर में एक विवाह के प्रस्ताव के साथ 500 बीघा ज़मीन दहेज में दी गई, जिसके बाद नरौनी वहाँ बस गए। एक अन्य कथा में कहा गया है कि असांव में ब्राह्मणों ने भविष्यवाणी की,- यदि नरौनी वंश पाँच कोस तक घोड़ा दौड़ाए, तो जितनी ज़मीन घोड़ा तय करेगा, वह उसके अधिकार में आ जाएगी। इस घटना से उस क्षेत्र को ‘पचलख’ कहा जाने लगा।
शिव मंदिर एवं तालाब, सीताराम परिसर,ग्राम नरेन्द्रपुर, सिवान, बिहार
नरौनी परिवार की परंपरा केवल सैन्य पराक्रम तक सीमित नहीं रही, बल्कि इस वंश ने समाज के विविध क्षेत्रों—राजनीति, शिक्षा, संस्कृति और समाजसेवा में भी उल्लेखनीय योगदान किया है। प्रारंभिक काल में भरथुईगढ़ शाखा से संबद्ध योद्धा धज्जु सिंह ने विद्रोही राजा फतेह सिंह को पराजित कर हुस्सेपुर राज्य में शांति बहाल की और हथुआ राज के उत्तराधिकारी महेश दत्त साही तथा उनके पुत्र छत्तरधारी सिंह की सुरक्षा की। इस योगदान के सम्मानस्वरूप 1802 ईस्वी में हथुआ नरेश ने उन्हें ‘हथुआ बुजुर्ग’ की उपाधि प्रदान की। वहीं वंशीधर राय के पुत्र शक्ति सिंह ने नरेन्द्रपुर में सुदृढ़ गढ़ी का निर्माण कराया, जिनकी तलवार की ख्याति इतनी दूर तक पहुँची कि उनके पराक्रम की चर्चा दिल्ली के तख्त तक होने लगी-“चर्चा चलत, नित दिल्ली के तख्त बीच, साहब सकत सिंह तेरे तलवार की।” बाद के वर्षों में नरौनी वंशज तीन पारिवारिक शाखाओं—पूर्वी टोला, पकड़ी टोला, और दक्षिणी टोला में विभाजित हो गए। यद्यपि इन टोलों के नामकरण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अब विस्मृत हो चुकी है किंतु लोककथाओं में इसकी स्मृति आज भी जीवित है-“ताल के मछली, उ पछटहेड़वा के आम, पकड़ी (पेड़) तर के बैठकी, कहाँ विसरला राम।”
नरौनी वंश के सीताराम सिंह ने सन 1880 में गाँव में शिव मंदिर और एक तालाब का निर्माण कराया जो आज भी धार्मिक श्रद्धा और सामुदायिक जीवन के केंद्र हैं। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जस्टिस शंभू प्रसाद सिंह जैसे सुप्रसिद्ध न्यायविद ने ‘वंश गाथा’ (1997) जैसे ऐतिहासिक लेख की रचना कर नरौनी वंश की ऐतिहासिक स्मृति को दस्तावेजीकृत किया। नरौनी राजपूतों के वंशज उमाकांत सिंह 1942 की अगस्त क्रांति के दौरान 11 अगस्त को पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराते हुए ब्रिटिश गोलीबारी में शहीद हुए। उनकी स्मृति में उमाकांत सिंह उच्च विद्यालय एवं बाजार क्षेत्र मे उमाकांत सिंह शाहिद स्मारक का निर्माण कराया।
नरौनी वंश के विभिन्न पीढ़ियों ने सामाजिक, शैक्षिक, और सांस्कृतिक उत्थान में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। इन्हीं साझा प्रयासों से गाँव में गांधी स्मृति, शंभू प्रसाद सामुदायिक भवन, कविता स्मृति अगस्त क्रांति पुस्तकालय, शिवकुमार सिंह संगीत महाविद्यालय, राम किशोरी देवी अस्पताल, रंगकरघा, और नरेन्द्रपुर हाट बाजार (पुनर्विनीकरण) की स्थापना संभव हो सकी। डॉ. फणीश प्रसाद सिंह, जो इस वंश के प्रखर सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और गांधीवादी विचारक रहे, ने भी गाँव में विद्यालय, अस्पताल, सांस्कृतिक केंद्र और संग्रहालय की स्थापना तथा स्वतंत्रता संग्राम, साहित्य और इतिहास विषयक कई पुस्तकों का लेखन-संपादन कर इस विरासत को सशक्त बनाया। नरौनी वंश की इन साझा पहलों ने नरेन्द्रपुर को सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से एक सशक्त केंद्र में रूपांतरित कर दिया है।
नरौनी वंश का सामाजिक योगदान समय के साथ और भी विस्तृत हुआ है। इस वंश के सदस्यों ने शिक्षा, संस्कृति, और ग्रामीण विकास के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण संस्थानों की स्थापना की। पटना, पुणे, लुधियाना और कोयंबटूर में विद्यालयों की श्रृंखला, नरेन्द्रपुर में ग्रामीण विकास संस्थान ‘परिवर्तन’, और दिल्ली, शांतिनिकेतन, अहमदाबाद, पटना, गोवा में कला-संस्कृति केंद्रों की स्थापना इस वंश की सामाजिक प्रतिबद्धता और रचनात्मक दृष्टिकोण को दर्शाती है। साथ ही भोपाल में बच्चों के साहित्य को समर्पित संस्था की स्थापना इस वंश की सृजनशील परंपरा और सामाजिक उत्तरदायित्व का जीवंत प्रतीक है।
आज भी नरेन्द्रपुर परिवार अपनी ऐतिहासिक विरासत को संजोए हुए है और समाज, शिक्षा, कानून, प्रशासन, साहित्य, कला जैसे विविध क्षेत्रों में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। अपनी ऐतिहासिक जड़ों से गहरा जुड़ाव और आधुनिक सामाजिक उत्तरादायित्व का यह संगम नरेन्द्रपुर परिवार की पहचान बना हुआ है।
असांव गढ़

असांव गढ़ की वर्तमान स्थिति में टीले पर प्राचीन अवशेष स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, जो इसके ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व का संकेत देते हैं।
सिवान क्षेत्र में नरौनी वंश के पूर्वजों ने सबसे पहले असांव में अपना गढ़ स्थापित किया था, जो उनकी प्रारंभिक बसाहट का केंद्र माना जाता है। इस स्थल पर स्थित टीले की संरचना और भू-आकृति यह संकेत देती है कि यह एक पुरातात्विक महत्व का स्थान है। यहीं से उनके वंशज क्रमिक रूप से सिवान जिले के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर बसे और अपने-अपने गढ़ों की स्थापना की। मौखिक इतिहास के अनुसार, जब नरौनी राजपूत बलिया से असांव पहुँचे, तो उन्होंने एक किले का निर्माण कराया। टीले पर मिले रेड वेयर के कुछ अवशेष इसे मध्यकालीन पूर्ववर्ती समय से जोड़ते हैं। इसके अतिरिक्त टीले से प्राप्त कालिख और राख यहाँ पर पुराने बसबट की ओर संकेत करती है। वर्तमान में यह टीला अत्यंत जर्जर स्थिति में है और संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे ढहने की कगार पर है।
कुल देवी मंदिर
असांव क्षेत्र में बसने वाली शाखा ने यहाँ अपनी कुलदेवी की स्थापना की और एक मंदिर का निर्माण किया।
कुलदेवी का नाम अब विस्मृत हो गया है। पूजा की विधियाँ देवी दुर्गा की पूजा संस्कारों से मेल खाती हैं इससे यह आभास होता है कि नरौनी राजपूतों की कुल देवी संभवतः देवी सती थीं। कुछ लोग इन्हें कुमारी देवी या झरनी देवी भी कहते हैं। पहले कच्ची मिट्टी से बना मंदिर समय के साथ साथ अब सीमेंट और कान्क्रीट का बन गया है।
असांव का कुल देवी मंदिर (जीर्णोद्धार के बाद)
2016 में मंदिर के जीर्णोद्धार का प्रयास किया गया जिससे इसका प्राचीन रूप बदल गया है। नरेन्द्रपुर स्थित परिवार के वर्तमान वंशज (संजीव कुमार) ने पहल कर, सब वंशजों को जोड़कर यह महती कार्य किया।
असांव का प्राचीन कुआँ
मंदिर के पास एक कुआँ है जो संभवतः 18 वीं शताब्दी में निर्मित हुआ था। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह बहुत बड़ा कुआँ है जिसकी तुलना पटना स्थित कदम कुआँ के कुएँ से की जा सकती है।
नरेन्द्रपुर गढ़
जिस टीले पर नरेन्द्रपुर शाखा के परिवार पहले पहल बसा उसका ऐतिहासिक महत्व बहुत है। उसकी ऊंचाई और आसपास के खंदकों की वजह से। 60/50 मीटर के वर्गफल में फैला और 2 मीटर की ऊंचाई वाला यह टीला अपनी बनावट की वजह से और धूसर रंगत की वजह से जिज्ञासा जगाता है और खोज की माँग करता है। यहाँ से लाल बर्तनों के अवशेष (रेड वेयर), और काले और लाल बर्तनों (ब्लैक एंड रेड वेयर) के अवशेष भी पाए गए हैं। पटना स्थित के पी जायसवाल रिसर्च इंस्टिट्यूट के अपने प्रारंभिक पुरातात्विक अन्वेषण उपरांत पाया कि ये अवशेष संभवतः मध्ययुगीन हैं। यहाँ चाक पर बर्तन ढाले जाते थे। लाल बर्तनों पर चिकनाहट है। काले-लाल बर्तन का होना उच्च तकनीक की ओर इशारा करता है। ये डबल फ़ाइरिंग से निर्मित होते हैं जो बिहार और बंगाल में पाये जाते है। पुरातात्विक खुदाई पर घरों, रसोई और अन्य बर्तनों के अवशेष मिलने पर अन्य रोचक तथ्य उजागर हो सकते हैं
जन्म संस्कार
छठीयारा – बच्चे के जन्म के 6 दिन बाद गीत संगीत और खान पान के साथ मनाया जाता है।
इसका अर्थ बच्चे को समुदाय में विधिवत रूप से शामिल करना है।
कुद खेत – महिलायें खेत में एकत्र हो पवित्र रीतियाँ निभाती हैं और धरती से अपना संबंध प्रकट करती हैं। यह रीति नरौनी राजपूतों की धरती से भावनात्मक संबंध को दर्शाती है
नहाऊना – माँ और बच्चे को उत्सवी ढंग से, आशीर्वाद और प्रार्थनाओं के संग नहलाने का रिवाज।
खुटहरा – लड़के के पैदा होने पर उससे तलवार छुआई जाती है। जिससे आगे चलकर वह योद्धा बने और परिवार और समुदाय की रक्षा करे।(यह प्राचीन परंपरा है जब नरौनी लोग युद्ध करते थे और निरंतर प्रवास में रहते थे।)
मुंडन – जब बच्चे 7-9 साल की उम्र के होते हैं तो उनके सर के बाल उतारे जाते हैं। इस संस्कार के दौरान पूजा, अनुष्ठान के साथ साथ उत्सव मनाया जाता है और खान पान किया जाता है। इस क्षेत्र के नरैनी राजपूतों ने अपनी पुरानी परंपरों को निभाने का क्रम अभी भी जारी रखा है।
विवाह संस्कार
बिहार में प्रचलित विवाह संसकारों को नरौनी भी नरेन्द्रपुर में निभाते हैं।
छेंका – पंडितों एवं ज्योतिष आचार्यों की मदद से शुभ दिन तय किया जाता है और विधिवत छेंका किया जाता है। जिसका अर्थ –विवाह का दोनों पक्षों की सहमति से तय हो जाना होता है।
तिलक – उपहारों का आदान प्रदान एवं लड़के को तिलक कर विवाह बंधन पर सहमति प्रकट की जाती है।
हल्दी – यह उत्साह एवं चुहल के साथ विवाह से पहले सम्पन्न होने वाला संस्कार है। लड़के को अपने घर पर और लड़की को अपने घर पर हल्दी लगाई जाती है। इसके बाद लड़के वालों के घर हरिस खड़ा किया जाता है जिसे बनाने में बांस और आम के पत्तों का उपयोग होता है।
विवाह – यह संस्कार बहुत शानदार प्रकार से सम्पन्न होता है। पहले हाथी, घोड़ों पर जुलूस की शक्ल में बारात लड़के के घर से लड़की के घर तक जाती थी। आज चार पहिए वाहन आदि से जाती है
विदाई – लड़की अपने दूल्हे के साथ अपने माता-पिता का घर छोड़ती है और एक भावुक दृश्य उत्पन्न होता है। आशीर्वाद एवं उपहारों से लड़की को विदा किया जाता है।
जलुआ – पहले बारात में महिलायें नहीं जाती थीं। वे पूरी रात जागकर जलुआ खेलती थीं। ठीक आज के रोल प्ले की तरह यह चुहल से भरा होता था। महिलायें एक दूसरे को खुशमिजाजी से कोसती थीं और गाली गलौज करती थीं। वे घर के पुरुषों को भी इसी तरह अश्लील मज़ाक का हिस्सा बना उनका नाम लेकर खेलती थीं।
मृत्यु संस्कार
यह संस्कार पूरी सौम्यता से मनाया जाता है। विवाहित महिला की मृत्यु पर उसका चूड़ी बिंदी कपड़ों से शृंगार किया जाता है फिर अग्नि को समर्पित किया जाता है। बड़ा पुत्र या परिवार का कोई पुरुष मुखाग्नि देता हैं। आजकल पुत्र न होने पर पुत्रियाँ भी मुखाग्नि देने लगी हैं। नरौनी राजपूत मृत शरीर को देर तक नहीं रखते और जल्द ही अग्नि को समर्पित कर देते हैं। इनके पीछे उनके पुश्तैनी मध्य युग से चले आ रहे युद्ध एवं यात्रा के संस्कार रहे होंगे।
खान पान
इस क्षेत्र के नरौनी राजपूतों का खान पान अब स्थानीय बिहारी खाना ही है। पुआ, रोट, मीठा एवं नमकीन बजका के अलावा मांसाहारी व्यंजन का चलन बहुतायत में है।



















































